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rituk


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कोई एक हाथ उनको बुझाने नहीं बढ़ता

Posted On: 25 Dec, 2012  
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सोचिये ज़रा

Posted On: 25 Dec, 2012  
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ऐसे अपराध होंवे ही क्यों ?

Posted On: 20 Dec, 2012  
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ऐसे अपराध होंवे ही क्यों ?

Posted On: 20 Dec, 2012  
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हर भारतीय कहे……………….जय हिंद!

Posted On: 17 Sep, 2012  
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Posted On: 17 Sep, 2012  
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वहमात्र दु धारू पशुही हैं,

Posted On: 6 Sep, 2012  
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धर्म को बस धर्म ही रहने दे

Posted On: 5 Sep, 2012  
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सीता आज भी निर्वासित ही है

Posted On: 4 Sep, 2012  
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यह कैसी आधुनिकता

Posted On: 3 Sep, 2012  
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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आपका कथन एकदम सही है प्रेम विवाह के विरूद्ध मैं भी नहीं किन्तु मैं एक संकीर्ण सोच के लिए अवश्य बोलूंगी जो समाज में फ़ैल रही है!प्रेम विवाह के चलन के कारण जो पारिवारिक लड़कियां अछे से शिक्षित होने के बावजूद अपने परिवार की भावनाओं को रखती हैं उनके सामाजिक प्रबंधित विवाह में विषमताए आजाती हैं! उनके लिए स्तिथियाँ यह बन जाती हैं के उनको सुयोग्य वर ढूंढे नहीं मिलता! दूसरा प्रेम पाप नहीं किन्तु यदि उसको पारिवारिक स्वीकार्यता नहीं तोह वह बोझ बन जाता है जैसा आपने भी कहा है! हमारा सिर्फ अपने लिए ही नहीं वरन हमारे समाज और देश के लिए भी कर्तव्य है, ऐसे में मात्र स्वछ्कान्द होकर ऐसा फैसला करना अनुचित होगा. एक आज के समय की विडम्बना है के लड़के व उनके परिवार संकीर्ण हो गए हैं, क्यों कर ? यह शिक्षित तकीनीकी विशेषज्ञ अपने जीवन साथी में अब भार्या सहचरी की छवि के स्थान पर, इंजिनीयर , प्रबन्धन विशेषग्य या अन्य कोई पद देखने लगे हैं, अतः यह वाला वर्ग एक उद्देश्य लेकर कालेक के अंतिम सत्र में या फिर अपने कार्यालय में जीवनसाथी निर्धारित कर तलाशते हैं! और इनका मात्र ध्येय एक छवि होती हैं! अब जो कला संकाय से शिक्षित है उसकी शिक्षा इनकी द्रष्टि में निम्न है, तोह यह नवजात संकीर्ण विचारधारा के धनी समाज के लिए मेरा यह ब्लॉग था! प्रेम कभी उद्देश्य लेकर नहीं किया जाता यह ईश्वर की आराधना जैसा है हम कब किसी की भावो में समा जाते हैं पता नहीं चलता, इसमें साथी का सम्मान अपने लिए महती हो जाता है, किन्तु जब हम यह देखे के फलां कन्या इंजिनीयर है अमीर है इससे विवाह सर्वोत्तम होगा भविष्य मनोरम होगा, तब यह सामाजिक रूप से ही नहीं अत्मिल और प्रकृति के विरूद्ध है! और इस प्रकार के प्रेम में प्रेमी समाज की समस्त सीमायें लांघकर समाज में दूषित वातावरण लाते हैं. प्रेम और लालच में अंतर को समझना नितांत ज़रूरी है!

के द्वारा: rituk rituk

ऋतू जी, आपके लेख को नमन करता हूँ....आज भी अन्य जातियों और धर्मों में विवाह करने वाले 90 फीसदी से ज्यादा विवाह में परिवार वाले साथ नहीं होते, उन्हें प्रेम विवाह से उतना कष्ट नहीं होता जितना की बिरादरी से बाहर विवाह होने का इसी वजह से ज़्यादातर युवक और युवतियां घर वालों से बिना बताये अथवा बताने के बाद घर छोड़कर जाने के बाद प्रेम विवाह कर लेते हैं.....आपने संस्कारों की बात की तो इसमें कोई हर्ज नहीं है की दो युवा जो एक दुसरे को पहले से जानते हैं वे एक-दुसरे को समझने के बाद विवाह कर लें...लेकिन परिवार के लोग दकियानूसी सोंच के चलते इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं जुटा पाते जिसका ज़्यादातर मामलों में अंजाम अच्छा नहीं होता, कई बार जब बिरादरी के बाहर के जोड़ा अपने घरवालों के साथ रहता भी है तो विवाह के बाद सालों तक ताने मारे जाते हैं तथा उन्हें हर कष्ट का कारण बिरादरी के बाहर विवाह करने को ही बताया जाता है, जबकि आज के समय में जबकि 90 फीसदी से ज्यादा विवाह बिरादरी में ही हो रहे हैं, वहां भी कष्ट है, लड़ाई-झगडा है, तलाक होता है! लेकिन अगर आपने बिरादरी के बाहर विवाह कर लिया तो बस एक मुद्दा होता है हर कष्ट का कारण गैर बिरादरी में शादी.... सब जानते है जाती-धर्म मानवीय कुरचना है लेकिन इसे त्यागने की हिम्मत बहुत कम लोगों में है.....धर्म का मतलब आचरण से होता है लेकिन आज तो ज़्यादातर लोगों का आचरण भ्रश और नष्ट हो चूका है फिर ये ढोंग किसलिए किये जा रहे हैं.....पूरा देश किसी न किसी मुद्दे को लेकर आपस में टकराव की स्थिति में है..... कही धर्म कहीं जाती कहीं लिंग कहीं राज्य....ऐसे में किन संस्कारों की फिक्र की जाए, सारे संस्कार परिवार वालों के साथ हैं....बाहर निकलते ही सब पराये हो जाते है!

के द्वारा: Anil Kumar "Pandit Sameer Khan" Anil Kumar "Pandit Sameer Khan"

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव




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